राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम
श्रीनिधि पांडेय1 आभा तिवारी2
1.शोधार्थी, दूधाधारी बजरंग महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर
2.दूधाधारी बजरंग महिला स्नात. महाविद्यालय, रायपुर
राहुल सांकृत्यायन जिन्हे महापंडित की उपाधि दी जाती है । हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे । वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होने यात्रा वृतांतध् यात्रा साहित्य तथा विश्व दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए । वह हिन्दी यात्रा साहित्य के पितामह कहे जाते है।
‘‘यात्रा वर्णन लिखने वाले साहित्यकारों में राहुलजी का नाम सबसे पहले आता है । देश- विदेश के अनुभवों का जब हम वर्णन करते है तो उनकी शैली और अधिक रसात्मक हो जाती है । वास्तव में इस रसात्मकता का आधार इनका अनुभव रहता है ।‘‘1
राहुल सांकृत्यायन उन विशिष्ट साहित्य सर्जकों में है जिन्होने जीवन और साहित्य दोनो को एक तरह से जिया । उनके जीवन के जितने मोड आये, वे उनकी तर्क बुध्दि के कारण आये । बचपन की परिस्थिति व अन्य सीमाओं को छोडकर उन्होने अपने जीवन में जितनी राहों का अनुकरण किया वे सब उनके अंतर्मन की छटपटाहट के द्वारा तलाशी गई थी । जिस राह को राहुल जी ने अपनाया उसे निर्भर होकर अपनाया । वहाॅं न द्विविधा थी न ही अनिश्चय का कुहासा । ज्ञान और मन की भीतरी पर्तों के स्पदंन से प्रेरित होकर उन्होने जीवन को एक विशाल परिधि दी । उनके व्यक्तित्व के अनेक आयाम है । उनकी रचनात्मक प्रतिभा का विस्तार भी राहुलजी के गतिशील जीवन का ही प्रमाण है । उनके नाम के साथ जुडे हुए उनेक विशेषण है । शायद ही उनका नाम कभी बिना विशेषण के लिया गया हो । उनके नाम के साथ जुडे हुए कुछ शब्द है - महापंडित, शब्द - शास्त्री, त्रिपिटकाचार्य, अन्वेषक, यायावर, कथाकार, निबंध - लेखक, आलोचक, कोशकार, अथक यात्री और भी जाने क्या - क्या । जो यात्रा उन्होने अपने जीवन में की, वही यात्रा उनकी रचनाधार्मिता की भी यात्रा थी । राहुलजी को कृतियों की सूची बहुत लंबी है । उनके साहित्य को कई वर्गो में बाॅंटा जा सकता है । कथा साहित्य जीवनी, पर्यटन, इतिहास, दर्शन, भाषा - ज्ञान, व्याकरण, कोश-निर्माण, लोक साहित्य, पुरातत्व आदि । बहिर्जगत् की यात्राएॅं और अंतर्मन के आंदोलनों का समन्वित रूप है राहुलजी की रचना - संसार घुमक्कड उनके बाल - जीवन से ही प्रारंभ हो गई और जिन काव्य - पंक्तियों से उन्होने प्रेरणा ली वे है ‘‘ सैर की दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाॅं, जंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाॅ ‘‘
राहुलजी जीवन पर्यन्त दुनियाॅं की सैर करते रहे । इस सैर में सुविधा असुविधा का कोई प्रश्न ही नही था । जहाॅं जो साधन उपलब्ध हुए उन्हें स्वीकार किया । वे अपने अनुभव और अध्ययन का दायरा बढाते रहे । ज्ञान के अगाध भंडार थे राहुलजी । राहुलजी का कहना थ कि उन्होने ज्ञान को सफर में नाव की तरह लिया है । बोझ की तरह नही । उन्हे विश्व पर्यटक का विशेषण भी दिया गया । उनकी घुमक्कडी प्रवृत्ति ने कहा ‘‘घुमक्कडों संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है ‘‘। अनेक ग्रंथो की रचना में उनके यात्रा - अनुभव प्रेरणा के बिंदु रहे है । न केवल देश में वरन् विदेशों में भी उन्होने यात्राएॅं की, दुर्गम पथ पार किए।
इस वर्ग की कृतियों में कुछेक के नाम है - लद्दाख यात्रा, लंका यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष, एशिया के दुर्गम भूखंडो में, मेरी यूरोप यात्रा, दार्जिलिंग परिचय, नेपाल कुमाउॅं जौनसार, देहरादून आदि । जहाॅं भी वे गये वहाॅं की भाषा और वहाॅं की संस्कृति और साहित्य का गहराई से अध्ययन किया । अध्ययन से घुलमिल कर वहाॅं की संस्कृति और साहित्य का गइराई से अध्ययन किया । अध्ययन की विस्तृत, अनेक भाषाओं का ज्ञान, धूमने की अद्भुत ललक, पुराने साहित्य की खोज, शोध - परक पैनी दृष्टि समाजशास्त्र की अपनी अवधारणाएॅं, प्राकृत इतिहास की परख आदि वे बिंदु है जो राहुलजी की सोच में यायावरी में विचारणा में और लेखन में गतिशीलता देते रहे । उनकी यात्राएॅं केवल भूगोल की यात्रा नहीं है ंयात्रा मन की है, अवचेतन की भी है चेतना के स्थानांतरण की है । व्यक्तिगत जीवन में भी कितने नाम रूप बदले इस रचनाधर्मी ने । बचपन में नाम मिला केदानाथ पांडेय, फिर वही बने दामोदर स्वामी, कहीं राहुल सांकृत्यायन, कहीं त्रिपिटकाचार्य .... आदि नामों के बीच से गुजरना उनके चिंतक का प्रमाण था । राहुल बाह्य यात्रा और अंतर्याता के विरले प्रतीक है ।
‘‘इतिहास की खोज में भटकते रहने वाले राहुल जी की प्राचीन काल की पकड इतनी सूक्ष्म और इतनी मौलिक थी कि वहां वह अपने अनुसंधान के बल पर बीते युग के चलचित्रों की सृष्टि कर देते थे, वहां वह एक ऐसी दिशा की ओर भी संकेत कर देते थे जिधर का मार्ग लोगो को परिचित नही था ।‘‘2
राहुलजी का पूरा जीवन साहित्य को समर्पित था । साहित्य - रचना के मार्ग को उन्होने बहुत पहले से चुन लिया था । सत्यव्रत सिन्हा के शब्दों में - ‘‘वास्तविक बात तो यह है कि राहुलजी ने किशोरावस्था पार करने के बाद ही लिखना शुरू कर दिया था । जिस प्रकार उनके पाॅंव नही रूके उसी प्रकार उनके हाथ की लेखनी भी नहीं रूकी । उनकी लेखनी की अजस्रधारा से विभिन्न विषयों के प्रायः एक सौ पचास से अधिक ग्रंथ प्रणीत हुए । ‘‘
राहुलजी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष है - स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी । भारत को आजादी मिले यह उनका सपना था और इस सपने को साकार करने के लिए वे असहयोग आंदोलन में निर्भय कूद पडे । शहीदों का बलिदान उन्हें भीतर तक झकझोरता था । उन्होने अपने एक भाषण में कहा था - ‘‘ चैरी - चैरा कांड में शहीद होने वालों का खून देश - माता का चंदन होगा ।‘‘
राहुलजी के व्यक्तित्व में परहेज जैसी कोई संकीर्णता नही थी । विगत को जानना और उसमें पैठना, वर्तमान की चुनौती को समझना और समस्याओं से संघर्ष करना, भविष्य का स्वप्न सॅंवारना - यह राहुलजी की जीवन पध्दति थी । अतीत का अर्थ उनके लिए महज इतिहास को जानना नहीं था, वरन् प्रकृत इतिहास को भी समझना और जानना था । इतिहास का उन्होने नयें अर्थ में उपयोग किया । उनके शब्दों में - ‘‘ जल्दी ही मुझे मालूम हो गया कि ऐतिहासिक उपन्यासों का लिखना मुझे हाथ में लेना चाहिए. कारण यह कि अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों को सामने लाकर पाठकों के हृदय में आदर्शों के प्रति प्रेरणा पैदा की जा सकती है -‘‘ उनकी अनेक कृतियां जैसे, सतमी के बच्चे, जोंक, बोल्गा से गंगा, जययौधेय, सिंह सेनापति आदि इस बात के परिचायक है कि राहुलजी इतिहास, पुरातत्व, परंपरा, व्यतीत और अतीत को अपनी निजी विवेचना दे रहे थे । राहुलजी की इतिहास दृष्टि विलक्षण थी । वे उसमें वर्तमान और भविष्य की कडियां जोडते थे । इतिहास उनके लिए केवल ‘घटित‘ का विवरण नहीं था । उसमें से वे दार्शनिक चिंतन का आधार ढॅंूढते थे ।
पूरे विश्व साहित्य के प्रति राहुलजी के मन में अपार श्रध्दा थी । वह साहित्य चाहे इतिहास से संबंधित हो या संस्कृति से, अध्यात्म से संबंधित हो या यथार्थ- से सबको वे शोधार्थी की तरह परखते थे । उनकी प्रगतिशीलता में अंतर्राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को देखने का आग्रह था ओढी हुई विदेशी सम्यता उनकी दृष्टि में हेय थी । वे अपनी भाषा, अपने साहित्य के पुजारी थे । वह साहित्य चाहे संस्कृत का हो, चाहे हिन्दी का, चाहे उर्दू का चाहे भोजपुरी का । राष्ट्रीय चेतना के संदर्भ में वे कहते थे कि ‘‘यदि कोई गंगा मइया‘‘ की जय बोलने के स्थान पर बोल्गा की जय बोलने के लिए कहे तो मैं इसे पागल का प्रलाप ही कहॅूंगा ।
बोलियों और जनपदीय भाषा का सम्मान करना राहुलजी की स्वभावगत विशेषता थी । भोजपुरी उन्हें प्रिय थी। क्योंकि वह उनकी माटी की भाषा थी । लोक-नाट्य परंपरा को वे संस्कृति का वाहक मानते थे । लोकनाटक और लोकमंच किसी भी जनआंदोलन में अपनी सशक्त भूमिका निभाते है, यह दृष्टि राहुलजी की थी । इसलिए उन्होने भोजपुरी नाटकों की रचना की । इसमें उन्होने अपना नाम ‘‘राहुल बाबा‘‘ दिया । सामाजिक विषमता के विरोध में इन नाटकों में और गीतों में अनेक स्थलों पर मार्मिक उक्तियाॅं कही गई है । बेटा और बेटी के भेदभाव पर कही गई वे पंक्तियाॅं दृष्टव्य है - ‘‘एके माई बापता से एक ही उदवा में दूनों में जनमवाॅं भइल रे पुरखवा, पूत के जनमवाॅं मंे नाच और सोहर होला बैटी जनम धरे सोग रे पुरखवा‘‘ । भोजपुरी में इन नाटकों को वे वैचारिक धरातल पर लाए और जन - भाषा में सामाजिक बदलाव के स्वर को मुखरित किया । ज्ञान की इतनी तीव्र पिपासा और जन - चेतना के प्रति निष्ठा ने राहुलजी के व्यक्तित्व को इतना प्रभा - मंडल दिया कि उसे मापना किसी आलोचक की सामथ्र्य के परे है । इसके अलावा जो सबसे बडी विशेषता थी - कि वह यह थी कि यश और प्रशंसा के उॅंचे शिखर पर पहुॅंचकर भी वे सहृदय मानव थे राहुलजी भाषात्मक एकता के पोषक थे । वह सांप्रदायिक सद्भाव के समर्थक थे । अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे । वे हर भाषा और उसके साहित्य को महत्व ही नही देते थे, वरन् उसे अपनाने की बात कहते थे । हिन्दी के अनन्य प्रेमी होने के बावजूद वे उर्दू और फारसी के साहित्यकारों की कद्र करते थे, वे कहते है ‘‘ सौदा और आतिश हमारे है गालिब और दाग हमारे है । निश्चय ही यदि हम उन्हें अस्वीकृत कर देते है तो संसार में कहीं और उन्हें अपना कहने वाला नहीं मिलेगा ‘‘
राहुलजी अद्भुत वक्ता थे । उनका भाषण प्रवाहपूर्ण और स्थायी प्रभाव डालने वाला होता था । एक बार आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने राहुलजी की भाषण शक्ति की प्रशंसा करते हुए कहा था ‘‘मैने गोष्ठियों, समारोहो, सम्मेलनों में वैसे तो बेधडक बोलता हॅंू लेकिन जिस सभा, सम्मेलन या गोष्ठी में महापंडत राहुल सांकृत्यायन होते है, वहाॅं बोलने में सहमता हूंू । उनके व्यक्तित्व एवं अगाध विद्वता के समक्ष अपने को बौना महसूस करता हॅंू । ‘‘ द्विवेदीजी का यह प्रशस्तिभाव इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योकि द्विवेदीजी स्वयं हिन्दी के असाधारण वक्ता और असाधरण विद्वान थे । राहुलजी की कृतज्ञ भावना उनकी पुस्तक ‘‘जिनका मैं कृतज्ञ‘‘ में देखने को मिलती है । इसके प्राक्कथन में उन्होने लिख है कि ‘‘ जिनका मैं कृतज्ञ लिखकर उस ऋण से उऋण होना चाहता हॅंू । जो इन बुजुर्गो और मित्रों का मेरे उपर है । उनमें से कितने ही इस संसार में नही है । वे इन पंक्तियों को नही देख सकते । इनमें सिर्फ वही नही है जिनमें मैने मार्गदर्शन पाया था । बल्कि ऐसे भी पुरूष है जिनका संफ मानसिक संबल के रूप में जीवन यात्रा के रूप में हुआ । कितनो से बिना उसकी जानकारी उनके व्यवहार और बर्ताव से मैने बहुत कुछ सीखा। मनुष्य को कृतज्ञ होना चाहिए ।‘‘
राहुलजी का व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था कि उसको शब्दों की परिधि में बाॅंधना दुःसाध्य है । उनका अध्ययन और लेखन इतना विशाल है कि कई - कई शोधार्थी भी मिलकर कार्य करे तो भी श्रम और समय की कोई एक सीमा निर्धारित नही की जा सकती । प्रवाहपूर्ण लेखनी और पैनी दृष्टि से वे ऐसे रचनाधर्मी थे, जिन्होने अपने जीवनकाल में ही यश के उॅंचे शिखर छू लिए थे । राहुलजी शब्द-सामथ्र्य और सार्थक और सार्थक - अभिव्यक्ति में मूर्तिमान रूप थे ।
‘‘साहित्य की अनेक विधाओं पर इतनी बडी संख्या में रचना कार्य राहुलजी की यात्राओं का परिणाम है । घुमक्कडी उनके लिए वरदान सिध्द हुई । विश्वपर्यटक राहुल के प्रति हिन्दी जगत सदैव नतमस्तक रहेगा ।‘‘3
संदर्भ ग्रंथ:-
1. रस्तोगी देवीचरण, हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास पृ. क्र. 284
2. सांकृत्यायन डाॅ. कमला, महामानव महापंडित, पृ. 99
3. माचवे डाॅ., प्रभाकर, राहुल सांकृत्यायन: व्यक्तित्व एवं कृतित्व, पृ. 156
Received on 11.12.2011
Revised on 05.01.2012
Accepted on 11.01.2012
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Research J. Humanities and Social Sciences. 3(1): Jan- March, 2012, 151-153